प्रेम गाथा (the love saga)

श्री कृष्ण - तुम्हें दिए हुए वचन की पूर्ति का शुभ मुहूर्त आ चुका है राधे। तुम चाहती थी कि तुम्हारे साथ गोलोक जेसा लोक धरती पर हो पर मेने वचन दिया था कि मेरी राधा गोलोक से मृत्युलोक अकेली नहीं जाएगी उसके साथ जाएगा उसका कृष्ण "वृन" यानी तुलसी जो बोहोत शुभ होती है और जहाँ राधा के कदम कृष्ण के साथ पड़े वो शुभ धरा वृंदावन केहलाएगी "वृंदावन"। जहां लिखी जाएगी राधा और कृष्ण की अमर प्रेम गाथा -
बिछड़ कर गई जिन कदमों से
मिलन की धरा पर उनका गिरना अभी शेष है
जो छोड़ेंगे धरा पर प्रेम के चिन्ह 
उन पदचिन्हों का मिलन अभी शेष है
विरह की अगन ने जलाया प्रेम की धरा को प्यास से शीतल हो गए बीज प्रेम के
उस धरा का हरा होना और बीजो का अंकुरत होना अभी शेष है
तुम जो छोड़ आई थी कुछ रेखाएं अधूरी एक संबंध अपूर्ण एक प्रीत अनछुई 
संबंधो की स्याही और प्रीत की कलम से प्रेम का चित्रण अभी शेष है 
नीरस,अशांत हो चुका था तुम बिन मेरा मन 
उसके एक कोने में प्रेम राग का गुंजन अभी शेष है 
होठों पर मुस्कान और लिये आँखो में क्रंदन छोड़ा था हाथ मेरा 
अब कभी ना विलग्न हो जो वो बंधन अभी शेष है 
मोन कर आई तुम जिस नाथ को
 भरने सबके ह्रदय में प्रेम से स्वर 
अब आँखे खोलेगा प्रेम जागेगा जग बस प्रीति नाथ का स्पन्दन अभी शेष है 

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